अपेन्डिक्स

जानिए अपेन्डिक्स के दर्द के बारे में, Expert से जानें बारिश में क्यों बढ़ जाता है इसका खतरा अपेन्डिक्स का दर्द बारिश के मौसम में और अधिक बढ़ जाता है, इसलिए इस मौसम में सावधानी और जरूरी हो जाती है।  अपेन्डिक्स लगभग चार-पांच इंच लंबी एक बंद और पतली नली होती है। यह वहां स्थित होती है, जहां छोटी आंत और बड़ी आंत मिलती हैं। सामान्यतया यह पेट के दाएं भाग में नीचे की ओर होती है। अपेन्डिक्स की वैसे हमारे लिए कोई उपयोगिता नहीं है। अपेन्डिक्स का संक्रमण घातक हो सकता है, इसलिए इसे सर्जरी कर निकाल दिया जाता है। क्या है अपेन्डिसाइटिसअपेन्डिसाइटिस का अर्थ है अपेन्डिक्स का संक्रमण। ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत तब होती है, जब अपेन्डिक्स का दूसरा किनारा अवरुद्ध हो जाता है। अपेन्डिसाइटिस अकसर 10 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के बीच में होता है। यह समस्या महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक सामान्य होती है । क्या हैं कारणअपेन्डिसाइटिस लिम्फोइड फॉलिकल का आकार बढ़ने और चोट आदि लगने से भी हो सकता है। जब अपेन्डिक्स में रुकावट आती है, तब बैक्टीरिया इसमें तेजी से बढ़ने लगते हैं। इससे पस का निर्माण होने लगता है। दबाव बढ़ने से उस स्थान की रक्त नलिकाएं भी दब सकती हैं। कैसे शुरू होता है दर्दइसका दर्द पेट में हल्की मरोड़ के साथ शुरू हो सकता है। बहुत कम मामलों में ऐसा देखा जाता है कि इसके लक्षण दिखाई देने के 24 घंटों के भीतर अपेन्डिक्स फट जाए। हालांकि जिन लोगों में लगातार 48 घंटे तक अपेन्डिसाइटिस के लक्षण दिखाई देते हैं, उनमें से 80 प्रतिशत लोगों में यह फट जाता है। ऐसी स्थिति घातक हो सकती है। सर्जरी ही है उपचार अपेन्डिसाइटिस का एकमात्र उपचार सर्जरी है। सर्जरी के पारंपरिक तरीके में एक बड़ा-सा लंबा कट लगाया जाता है। दूसरा तरीका है लैप्रोस्कोपी(इसमें 3-5 मिलीमीटर के छेद किये जाते हैं और शरीर के अंदर देखने के लिए दूरबीन का प्रयोग किया जाता है)। यह एक दिन की प्रक्रिया है। लक्षणों को जानें– पेट के निचले भाग में दर्द– भूख न लगना– जी मिचलाना– उल्टी होना– डायरिया की शिकायत– कब्ज रहना– हल्का बुखार रहना। बढ़ जाता है खतराभारत में अपेन्डिक्स के अधिकतर मामले बरसात के मौसम में ही देखे जाते हैं। इन दिनों बारिश होने के कारण वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। इस मौसम में बैक्टीरिया और वायरस का संक्रमण बढ़ जाता है, जिस कारण अपेन्डिसाइटिस के मामले भी अधिक होते हैं। इसलिए इस मौसम में ताजा खाना खाएं तथा साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। 

पाइल्स

पाइल्स, फिशर, फिस्टुला और पायलोनिडल साइनस में क्या अंतर है?   समान्यतः लोगो में यही धारणा है की इन सभी बिमारिओं का नाम सिर्फ पाइल्स ही होता है। लेकिन ये चारो अलग तरह की बीमारियां होतीं हैं  इनके होने के अलग अलग कारण होते हैं और  इनका ईलाज भी अलग तरह से किया जाता है। तो सबसे पहले जानेंगे की , पाइल्स किसे कहते हैं? पाइल्स या बवासीर एक खास प्रकार की बीमारी होती है जिसमे मलद्वार (Anus) के आस पास जो रक्त वाहिकाएं (Blood Vessels) जब सूज जाती है , तब इसे  पाइल्स कहते हैं।  कारण पुरानी कब्ज या दस्त (Chronic constipation or diarrhea) लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहे (Prolonged sitting on a toilet seat) धुम्रपान और शराब (Smoking & Alcohol) अस्वास्थ्यकारी आहार (Unhealthy Diet) अधिक वजन होना  (Being overweight) फिशर किसे कहते हैं? फिशर एक खास प्रकार की मलद्वार (Anus) की बीमारी है जिसमे मलद्वार (Anus) के किसी भाग में यदि कट या दरार लग जाये तो उसे फिशर कहते हैं। ये कट या दरार सामान्यतः 6 ‘O ‘ Clock के पोजीशन पर लगता है। लेकिन ये कट या दरार गर्भवती महिलााओं को ये 12 ‘O ‘ Clock पोजीशन पर लगता है। फिशर के लक्षण मल त्याग करते वक्त दर्द होना, जलन होना  या कभी कभी रक्ततस्राव होना  फिशर होने के कारण तनाव (Stress) लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहना  (Prolonged sitting on a toilet seat) कब्ज़ (Constipation) तथा, मल त्याग करते वक्त बहुत जोर लगाना  (Too much force during bowel movements) भगंदर (एनल फिस्टुला) किसे कहते हैं ? गुदा द्वार के आसपास एक छेद बन जाता है। जिससे की गुदा के अंदर संक्रमण फ़ैल जाता है , और ये मलद्वार से नितंब के रास्ते बाहर निकलने की कोशिश करता है , इसे ही भगंदर (एनल फिस्टुला) कहते हैं। पायलोनिडल साइनस किसे कहते हैं ? पायलोनिडल साइनस  एक छोटा सिस्ट या फोड़ा होता है, जोकि नितंबों के ऊपरी हिस्सों में या बीच में हो सकता है । यह ज्यादातर उन पुरुषों को होता है और साथ ही युवाओं में ज्यादा आम होता है जिनके नितम्बों के बीच में ज्यादा बाल होते हैं।  पायलोनिडल साइनस होने के कारण नितम्बों के बीच में ज्यादा बाल होना घर्षण (जो लोग ज्यादा देर तक बैठे रहते हैं ) अधिक वजन या मोटापा होना

हर्निया क्या है ?

क्या है ? जानिए इसके कारण, लक्षण, इलाज व बचाव।  हर्निया पेट के आंत की बीमारी होती है। हर्निया होने से पेट में छिद्र होने लगता है और सूजन के रूप में बाहर आ जाता है। जिससे कमर की मांसपेशिया कमजोर हो जाती है। हर्निया की बीमारी पुरुषो और महिलाओं दोनों में पायी जाती है। किंतु अधिकांशतः यह बीमारी पुरुषो में अधिक पायी जाती है। आइए हर्निया के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी लेते है। हर्निया कितने प्रकार का होता है ? (Types of Hernia in Hindi) हर्निया पांच प्रकार का होता है। अम्बिलिकल हर्निया छोटे बच्चों में होता है। छोटे बच्चो में छह महीने के अंदर वाले बच्चों में अधिक होता है। स्पोर्ट्स हर्निया पेट के निचले हिस्से और जांघ के बिच के भाग में होता है। इंसिजनल हर्निया पेट की सर्जरी होने के बाद किसी व्यक्ति को होने की संभावना रहती है। हाइटल हर्निया यह पेट के हिस्से में डायफ्राम के माध्यम से छाती तक पहुंच जाता है और पेट की मांसपेशियो पर प्रभाव डालता है। हर्निया के कारण क्या है ? (What are The Causes of Hernia in Hindi) व्यक्ति के भारी वजन उठाने के कारण होता है। चोट लगने के कारण हो सकता है। यदि कोई पुराना ऑपरेशन करवाया है तो उसके कारण भी हो सकता है। अधिक मोटापा के कारण हो सकता है। कब्ज की समस्या होने के कारण हो सकता है। गर्भावस्था में भी हो सकता है। बढ़ती उम्र होने के कारण होता है। लंबे समय तक खासी आने के कारण हो सकता है। हर्निया के लक्षण क्या है ? (What are The Symptoms of Hernia in Hindi) पेट की चर्बी का बाहर निकलना। मलमूत्र को त्यागने में परेशानी होना। पेट के निचले भाग में सूजन होना। लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने पर दर्द होना। हर्निया का इलाज क्या है ? (What are The Treatments for Hernia in Hindi) हर्निया का इलाज डॉक्टर सर्जरी के माध्यम से करते है। सर्जरी में भी दो तरह का सर्जरी होता है। ओपन सर्जरी और लेप्रोस्कोपिक सर्जरी। ओपन सर्जरी में मरीज को छह महीनो तक आराम करना पड़ता है। व्यक्ति छह महीने तक कोई भी चलने फिरने या व्यायाम की गतिविधि नहीं कर सकता है।   लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में जनरल एनेस्थेसिया और लोकल सर्जरी करते है। लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में शरीर पर छोटा चीरा लगाया जाता है। यह ऊतक के आस पास होता है। यह हानिकारक भी नहीं होता है। हर्निया से बचाव कैसे करे ?  (How to Prevent Hernia in Hindi) वजन को नियंत्रित रखे। स्वस्थ आहार का सेवन करे।   व्यायाम और योग करे जिससे कब्ज की समस्या नहीं होगी। वजन सामान उठाते समय तकनीक का उपयोग करे। बार बार खासी आती है। तो धूम्रपान करना छोड़ दे। लगातार खासी आने पर इसकी जांच डॉक्टर से करवाये और खासी का उपचार शुरू करे। शौच करने व मलमूत्र करने में अधिक दबाव लगाने से बचे। हर्निया के शुरुवाती लक्षण नजर आये, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे और हर्निया का इलाज करवाये।

     पित्ताशय की पथरी

GALL BLADDER(पित्ताशय):-यह थैलीनुमा आकार का अंग होता है, जो लिवर के निचले हिस्से में पाया जाता है, जिसका काम लिवर द्वारा बनाए गए पित्तरस को एकत्रित करना होता है| पित्त रस पाचन में सहायता करता है|  पित्ताशय की पथरी :-पित्ताशय में पाए जाने वाले छोटे छोटे पत्थरो को गाल ब्लैडर स्टोन कहा जाता है| अगर पित्ताशय में इन्फेक्शन हो जाएं या स्टोन नली में फंस जाता है, तो पेट के ऊपरी दाएं भाग में दर्द होना, छाती की हड्डी के नीचे दर्द, पेट के बीच में तेज और गहरा दर्द होना, कमर दर्द और दाएं कंधे में दर्द होता है|पथरी का दर्द कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटो या दिनों तक हो सकता है| पित्ताशय में पथरी होने का कारण:-  पित्ताशय में पाई जाने वाली पथरी कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने के कारण होती है एवं बिलीरुबिन एवं कैल्शियम की मात्रा बढ़ने से होती है|  पित्त लवण में कमी के कारण भी पथरी की समस्या हो सकती है| पित्ताशय में पथरी के प्रकार :- कोलेस्ट्रॉल गॉलस्टोन  पिगमेंट स्टेन गॉलस्टोन मिक्सड गॉलस्टोन किन लोगो को पित्ताशय में पथरी की सम्भावना अधिक होती है: – महिलाओ में पुरुषो से अधिक सम्भावना होती है  40 वर्ष से अधिक आयु के लोगो में  अधिक वसा युक्त पदार्थो का सेवन करना शुगर की बीमारी होना  लिवर की बीमारियाँ होना लक्षण :- तीव्र एवं गहरा दर्द- ऊपरी दाएं भाग में, पेट के बीच में कमर दर्द, छाती की हड्डी के नीचे, दाएं कंधे मे।  उल्टी खट्टी डकार बदहजमी  बहुत ज्यादा पसीना आना  एसिडिटी  पेट में भारीपन  कब्ज या दस्त  पेशाब का रंग गहरा पीला होना पेट फुलना जटिलताएं:- पीलिया  पित्ताशय में सूजन  पित्तनली में सूजन अग्नाशय में सूजन  पित्ताशय में कैंसर गॉलस्टोन का निदान:- सोनोग्राफी पेट की सोनोग्राफी के द्वारा पित्ताशय की पथरी का आसानी से पता लगाया जा सकता है  खून की जांच  पेशाब की जांच एक्सरे  सी टी स्कैन इलाज:-              पित्ताशय की पथरी के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण  जिसमे पित्ताशय  को शरीर से निकल दिया                जाता  है जिसे लेप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी कहा जाता है| लेप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी :-                         यह लेप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी सर्जरी है जिसमे पेट में छोटे छेद (५-७ INCH) के माध्यम से पूरी प्रक्रिया कर पित्ताश्य को निकल दिया जाते  है पित्ताशय में सूजन या पथरी को खत्म करने के लिए आमतौर पर अन्य कोई उपचार प्रभावी नहीं होता है  यह सर्जरी कौन नहीं करवा सकता है :- जो लोग एनेस्थिया  सहन नहीं कर सकते  लिवर की बीमारी के अंतिम चरण में  रक्त स्रव सबंधी विकारो में  पित्ताश्य के कैंसर में फायदे:- मरीज को कम दर्द में सर्जरी की प्रक्रिया हो जाती ह।  अस्पताल में बहुत कम समय के लिए भर्ती होना पड़ता है।  सर्जरी के बाद न्यूनतम दर्द एवं दवाईया। सर्जरी के बाद ध्यान रखने योग्य बाते:- कम वसा वाले आहार का सेवन करे  हल्का भोजन करे पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थो का सेवन  चाय, कॉफी के सेवन से बचे  एल्कोहल से परहेज करे  ज्यादा मीठा खाने से बचे पर्याप्त मात्रा में पानी पीए